Sunday, 5 November 2017

जीने की चाह

बंगले की कोठरी में जब उनकी नींद टूटी तो सामने खड़े इंसान को देख के वो अभी भी अपनी आंखो विश्वास नहीं कर पा रहीं थी। उनके जीवन के अन्तिम चरण में वो कैसे अपने सबसे ज्यादा प्रिय व्यक्ति के सामने थी, किस कारण ने उनके बेटे को विदेश से यहां गांव में खींच लाया था।
हालांकि, उनके पति के गुजरने के बाद उनकी जीने इच्छा खत्म हो गई थी, और जिसकी उम्मीद उन्हें कभी नहीं थी। करीब पंद्रह वर्षों के बाद उनका बेटा लौट  आया था पर अब समय ही कहा था के वो कुछ कह सके। जिस बेटे की सबसे ज्यादा आवश्यकता उन्हें उन दिनों में थी, आज वही बेटा उनके सामने था पर ना तो जीने की इच्छा थी और न ही वो शक्ति मानो शरीर और आत्मा दोनों ने ही निश्चय कर लिया हो के अब और नहीं। आंखों में अश्रु भरे बस सुशीला जी इतना ही बोल पाई "अब तू जो चाहे वो कर सकता है बेटा, चाहे तो मेरे पति के प्यार से सींचे हुऐ खेतो को संजो के रखे या उन्हें बेंच के और अपनी माटी छोड़ के विदेश चला जा। अब मैं और न तो कुछ कह सकती हूं न ही कर सकती हूं।" मशीन में तो दिल की धड़कन अभी भी दिख रहीं थीं लेकिन सुशीला की जीने की चाह अब समाप्त हो चुकी थी।
बेटा रात भर उनके पास ही रहता था, पछतावा उसे भी था मानो पर वो कुछ कह नहीं पा रहा था। वो वहीं बिस्तर के पास पड़े कुर्सी पर सो गया, आंखों के कोने से आसुओं की धारा सी बह गई। मां ने जब बिस्तर टटोला तो ठंडी सी आह भरी के अब वो चैन से जा सकती है।
सुबह होने में अब देर थी, ज्योही बेटे ने आंख खोली तो देखा के मां के ऑक्सीजन मास्क उनके हाथों में था, सांसे बंद थीं लेकिन चेहरे पे मुस्कान थी और कोई शिकन नहीं था।
बेटे के आंखों में पछतावे के अश्रु के सिवा सिर्फ उनका मृत शरीर उनका अपना था, बाकी तो बस दुनियादारी जिसको सुशीला जी न जाने कब का त्याग चुकी थीं।

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